सरगुजा : आमजनों से ज्यादा पुतले की जान प्यारी - अंचल ओझा
पिछले कुछ समय से सरगुजा जिले में जो कुछ देखने को मिल रहा है, वह कितना न्याय संगत है और कितना कानूनी यह तो आम जनता के समझ से परे है, किन्तु सच्चाई यह है की पिछले कुछ समय से जिले के पुलिसकर्मियों की जिम्मेदारी केवल इतनी है की वे अंबिकापुर में पुतला न जलने दें। यह हमारी प्रशासनिक व्यवस्था की हठधर्मिता कहिये या फिर सरकारी कुर्सी का पावर, जनता को वही करना है जो जिला प्रशासन के उच्च अधिकारी कहें। संविधान ने आमजनों को शान्ति पूर्वक जिस विरोध प्रदर्शन का अधिकार दिया है, उस पर भी पहरा बैठा हुआ है। पिछले कुछ समय से जिले में एक नई व्यवस्था का सूत्रपात हुआ है और वह है की चाहे जो कोई भी विरोध प्रदर्शन करे, कलेक्ट्रेट परिसर से लेकर घड़ी चौक से गांधी चौक तक पुलिस के ऐसे पहरे लगे होते हैं, मानों धरना प्रदर्शन में कोई शातिर अपराधी आया हुआ है अथवा कोई जेल से भागा कैदी यहां पंहुचा हो जिसे पकड़ने पुलिस छावनी में तब्दील कर दी गई हो। किन्तु सच कुछ और ही होता है, जिला प्रशासन के तुगलकी फरमान को मनवाना। बात सिर्फ पुतला फूंकने तक सिमित नहीं रहा, बल्कि पुतला सहित गाड़ी को पुरे कार्यक्रम तक जब्त करके रखना, जहाँ पुतला बन रहा था, वहां जाकर पुतला जब्त करना, सहित कई ऐसी बातें कल देखने को मिली जब नेशनल हेरल्ड मुद्दे पर कांग्रेसी गांधी चौक पर प्रदर्शन कर रहे थे। जिला प्रशासन और पुलिस की कार्यवाही हास्यप्रद है, जिस संजीदगी और गम्भीरता से पुतला जलने और पुतला जब्त करने की कार्यवाही कर रही है, उसी गंभीरता और संजीदगी के साथ चोरी की घटनाएं, आये दिन अडानी, एस ई सी एल का कोयला लेकर ओवर लोडिंग और तेजी के साथ गाड़ी चलाते चालको पर कार्यवाही होती तो शायद कई जान बच सकती थी, किन्तु बड़ी कम्पनियों से मिलने वाले चंदे और सी एस आर जैसी बातों पर जिला प्रशासन द्वारा अपनी बातों और कार्यों को कराने उन्हें खुली छुट दे रखी है, यही कारण है की कंपनियों के इशारे पर ट्रांसपोर्टर ओवर लोडिंग और तेजी से गाड़ी चलाकर आये दिन लोगों की जान ले रहे हैं, किन्तु जिस जिला प्रशासन को आमजनों की जान से ज्यादा पुतले की जान प्यारी हो, वहां ऐसा होना लाजमी है।
जिला प्रशासन के इस फरमान को मनवाने के लिये नगर के तीन थानों के टी आई, सी.एस.पी.,क्राइम ब्रांच के पुलिस कर्मी, अपर कलेक्टर, तहसीलदार सहित आधा दर्जन से अधिक् एस आई और सैकड़ों की संख्या में जवान घड़ी चौक से लेकर गांधी चौक और कलेक्टरेट तक जमा रहते है। जवानों की इस संख्या को देख कर मुझे याद आता है गांवों का वह क्षेत्र जहां सरकार को जमीन अधिग्रहण कर जमीन बक्साइड अथवा कोयला खनन के लिये दिया जाता है तो अधिग्रहण हेतु होने वाली जनसुनवाई भी इसी तरह से हथियारों से लैस जवानों की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बिच होता है, ताकि बिना विरोध प्रदर्शन के बड़ी कंपनियों को किसानों की जमींन मिल सके। सारे नियम कानून को ताक में रख कर संगीन के साये में गन्ने की खेती, जमींन अधिग्रहण की सुनवाई और विरोध प्रदर्शन कही होता है, तो वह सरगुजा ही है, जहाँ के नेता भी जिला प्रशासन से अपने काम निकलवाने के गरज में उसके सारे सही-गलत को ठीक है, कह कर जो हो रहा है वह कानून सम्मत ही होगा कह कर टाल जाते हैं और मौन रहकर इन कार्यवाहियों के प्रति अपनी मौन समर्थन देते हैं।
धन्य हैं नेता, धन्य है प्रशासन।
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